नई दिल्ली: इंडिया टीवी के लोकप्रिय शो "कॉफी पर कुरुक्षेत्र" में गुरुवार (11 जून) को इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि क्या लोकसभा में BJP को जल्द 360 सासंदों का सपोर्ट मिलने वाला है। क्या NDA का लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हो जाएगा और इससे फिर कौन-कौन से अटके बिल पास कराने सरकार के लिए आसान होंगे। चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर के साथ मेहमान के रूप में प्रदीप सिंह और आलोक मेहता मौजूद रहे।
क्या BJP के लिए आसान होगा समर्थन जुटाना?
कार्यक्रम में देश की सियासत में इन दिनों चर्चा में चल रहे एक नए शब्द- "मिशन 360" पर बात हुई। यह सिर्फ लोकसभा में सीटों का आंकड़ा नहीं, बल्कि उन बड़े संवैधानिक और राजनीतिक बदलावों से भी जोड़ा जा रहा है जिनकी चर्चा लंबे समय से हो रही है। महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने, परिसीमन और "वन नेशन, वन इलेक्शन" जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। इसी बीच कई विपक्षी दलों के नेताओं के बयान यह संकेत दे रहे हैं कि संसद में सरकार के लिए जरूरी समर्थन जुटाना पहले की तुलना में आसान हो सकता है।
बंगाल चुनाव परिणाम के बाद बदला सियासी माहौल
चर्चा के दौरान, राजनीतिक विश्लेषकों ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों के बाद राष्ट्रीय राजनीति का माहौल तेजी से बदला है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ रहा है और कई नेताओं के रुख में बदलाव दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में वाईएसआर कांग्रेस के पूर्व सांसद विजय साईं रेड्डी का बयान भी चर्चा का विषय बना, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि सरकार मानसून सत्र में महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन से जुड़े कदम उठाती है तो उसे दो-तिहाई बहुमत मिल सकता है। इस बयान ने राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी है।
किन दलों पर सबसे ज्यादा पड़ेगा परिसीमन का असर?
विश्लेषकों का मानना है कि डीलिमिटेशन का सबसे अधिक असर उन दलों पर पड़ सकता है जो लंबे समय से मौजूदा सीट संरचना का लाभ उठाते रहे हैं। कांग्रेस और कुछ दक्षिण भारतीय दलों की चिंताओं का केंद्र भी यही मुद्दा है। हालांकि, बदले राजनीतिक हालात में डीएमके और अन्य क्षेत्रीय दलों के रुख में नरमी आने की चर्चा है। यदि ऐसा होता है तो संसद में सरकार की स्थिति और मजबूत हो सकती है।
विपक्षी एकता पर भी उठे सवाल
दूसरी ओर, विपक्षी एकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी विवाद, शिवसेना (यूबीटी) में संभावित असंतोष और विभिन्न क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं विपक्ष के लिए चुनौती बनती दिख रही हैं। कांग्रेस की ओर से महंगाई और अन्य जनसरोकारों के मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की तैयारी की जा रही है, लेकिन सहयोगी दलों के अलग-अलग बयानों से उसकी रणनीति कमजोर पड़ती नजर आती है।
विपक्ष के सामने अस्तित्व और एकजुटता का संकट
कुल मिलाकर, देश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। एक ओर बीजेपी अपने दीर्घकालिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए संख्या बल मजबूत करने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष अपने अस्तित्व और एकजुटता की परीक्षा से गुजर रहा है। आने वाला मानसून सत्र इस राजनीतिक संघर्ष की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)